सोचे रेहेन दो जून की रोटी कमाना आसान होही, बड़े होएन त पता चलिस EMI घलो संग म आथे

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2 june ki roti : रायपुर। दो जून की रोटी हमर समाज के अइसन कहावत आय, जेकर मतलब सिरिफ पेट भरे बर खाना नई, बल्कि आम मनखे के मिहनत, कड़ा संघरस अउ रोजी-रोटी के कहानी ए। हर साल जब २ जून आथे, त ए कहावत के गोठ-बात फेर सुरु हो जाथे। बखत बदल गे, रहन-सहन अउ जरूरत घलो बदल गे, पर आज घलो करोड़ों मनखे मन बर दो टाम के इज्जत के रोटी कमाना सबले बड़े चिंता के बिसय आय।

का आय ‘दो जून की रोटी’ के मतलब?

दुर्गा कॉलेज के सहायक प्राध्यापक लोकेश्वर प्रसाद सिन्हा ह बताइन कि ए कहावत उत्तर भारत म अब्बड़ दिन ले चलत आथे। इहां ‘जून’ के मतलब महीना नई, बल्कि ‘बखत’ या ‘टाम’ (भोजन के समय) ले आय। यानी दिन म दो बखत के खाना जुटा पाना। देहाती अउ मजूर मनखे मन बर जब परिवार के पेट भरना ही सबले बड़े बूता रहिस, तब ए कहावत जनम लिस। आज के दिन ए ह कम से कम आर्थिक सुरक्षा अउ इज्जत के जिनगी के प्रतीक बन गे हे।

सोशल मीडिया म वायरल होवत हे ए मीम्स

आजकल ए कहावत सिरिफ किताब अउ गोठ-बात तक नई रह गे हे, बल्कि सोशल मीडिया म घलो एकर जम्मों डहर हल्ला हे। महंगाई, रोजगार अउ बढ़त खरचा ला लेके लोगन मन अब्बड़ मीम्स बनावत हें।

एक ठन मीम म लिखे हे– “बचपन म लगे रहिस कि दो जून की रोटी कमाना सउंहत होही, बड़े भएन त पता चलिस कि ईएमआई (EMI) घलो संग म आथे।”

ओहें दूसर मीम म लिखे हे– “दाई कहय कि पढ़-लिख ले, नई तो दो जून की रोटी बर तरस जाबे… अब हाथ म डिग्री घलो हे अउ जिनगी म संघरस घलो।”

काबर आज घलो जरूरी हे ए कहावत?

जानकार मन के कहना हे कि ए कहावत आज घलो एस्तर जरूरी हे काबर कि ए ह आम मनखे के सबले बड़े जरूरत अउ ओकर कमाई-खर्च ला सोझा देखाथे। तरक्की अउ आधुनिकता के ए जुग म घलो ‘दो जून की रोटी’ हमन ला चेताथे कि कतनो बिकास हो जाय, असली तरक्की तभे मान जाही जब हर मनखे अपन परिवार बर इज्जत से दो टाम के रोटी कमा सके।

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