क्या आप जानते हैं गुरु पूर्णिमा क्यों कहलाती है व्यास पूर्णिमा?
गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है,महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। उनके सम्मान में ही हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। वेद, उपनिषद और पुराणों का प्रणयन करने वाले वेद व्यास जी को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। बहुत से लोग इस दिन व्यास जी के चित्र का पूजन और उनके द्वारा रचित ग्रंथों का अध्ययन करते हैं।
गुरु को गोविंद से भी बड़ा कहा गया है। गुरु की पूजा कर हम अपने अत्यल्प ‘स्व’ को उसकी सर्वसमर्थ सत्ता में समर्पित अथवा विसर्जित कर देते हैं। पुष्पदंत विरचित ‘शिवमहिम्रस्तोत्रम’ के अनुसार गुरु से बढ़कर कोई तत्व नहीं है, ‘नास्ति तत्वं गुरो: परम्।’ भगवान वेदव्यास का जन्म एक द्वीप पर होने से ये ‘द्वैपायन’ और रंग काला होने के कारण ‘कृष्ण’ अर्थात कृष्णद्वैपायन कहलाए। इनका अवतार धर्म की रक्षा के लिए हुआ। इन्होंने अद्भुत शाश्वत धार्मिक साहित्य की रचना पर मानव जाति को ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखलाया। वस्तुत: हमारा सम्पूर्ण साहित्य ही ‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्व’ कहा गया है।
कैसे करें गुरु का पूजन?
गुरु पूर्णिमा के दिन केले की पूजा, व्रत एवं जो अपने गुरु के चरण पादुका की पूजा करता है, उसे वर्ष के दौरान सारे कर्मों में सफलता मिलती है। गुरु पूर्णिमा के दिन पितृ दोष, गुरुदोष एवं गृह-क्लेश निवारण के लिए हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, पुष्कर (राजस्थान), पिहोवा, गया (बिहार), प्रयाग, गोवर्धन इत्यादि तीर्थ स्थानों में सूर्योदय से एक घंटा पहले स्नान करके भगवान सत्यनारायण जी की कथा व सद्गुरु एवं भगवान विष्णु जी की पूजा, दान व भजन आदि का विशेष महत्व होता है। तीर्थों के सेवन व गुरु पूजा, ब्राह्मण, कुल पुरोहित व साधु की सेवा व भजन आदि का विशेष महत्व होता है। पाप भस्म होते हैं एवं मन की मुराद पूरी होती है।
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