Ekhabri धर्म दर्शन: विशेष क्या है जितिया व्रत? जानिए बिहार के इस खास पर्व की कहानी
(Ekhabri विशेष धर्म दर्शन) । बिहार में जितिया या जीउतिया व्रत माताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और जीवन में खुशहाली की कामना के लिए रखा जाता है। इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि व्रती महिलाएं कठिन निर्जला उपवास रखती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। बिहार के अलावा यह पर्व झारखंड, उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य क्षेत्रों में भी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
जितिया व्रत कब मनाया जाता है?
जितिया व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। हालांकि क्षेत्र और पंचांग के अनुसार तिथि एवं पूजा-पारण के समय में अंतर हो सकता है। इस पर्व की तैयारी आमतौर पर एक दिन पहले से शुरू हो जाती है। बिहार में जितिया पर्व की परंपरा में नहाय-खाय, ओठगन, मुख्य निर्जला व्रत और पारण जैसे अलग-अलग चरण देखने को मिलते हैं।
जितिया व्रत क्यों रखा जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और उसके स्वस्थ एवं सुखी जीवन की कामना से यह कठिन व्रत रखती हैं। व्रत के दौरान महिलाएं अन्न और जल का त्याग करती हैं और पूरे दिन भगवान जीमूतवाहन का स्मरण तथा पूजा करती हैं।
जितिया केवल एक धार्मिक उपवास नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच भावनात्मक रिश्ते का भी प्रतीक माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान के मंगल और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं। परंपरा में इसे मातृ प्रेम, त्याग और संकल्प से जोड़कर देखा जाता है।
जितिया व्रत की प्रसिद्ध कथा क्या है?
जितिया व्रत की कथा राजा जीमूतवाहन, नागराज के पुत्र शंखचूड़ और पक्षीराज गरुड़ से जुड़ी है। धार्मिक कथा के अनुसार जीमूतवाहन एक दयालु और परोपकारी राजा थे। एक दिन उन्हें एक वृद्ध महिला के विलाप का पता चला, जो अपने पुत्र के संकट में होने के कारण दुखी थी।
कथा के अनुसार नागों और गरुड़ के बीच एक व्यवस्था थी, जिसके तहत एक नाग को गरुड़ के सामने बलि के रूप में जाना पड़ता था। शंखचूड़ की बारी आने पर उसकी मां बेहद दुखी थी। जीमूतवाहन ने उसकी पीड़ा देखकर स्वयं को शंखचूड़ के स्थान पर प्रस्तुत कर दिया।
जीमूतवाहन के इस त्याग और करुणा से प्रभावित होकर अंततः गरुड़ ने उन्हें पहचान लिया और शंखचूड़ सहित अन्य नागों के जीवन की रक्षा हुई। इसी कथा को जितिया व्रत की प्रमुख धार्मिक कथाओं में शामिल किया जाता है।
भगवान जीमूतवाहन की पूजा का क्या महत्व है?
जितिया व्रत में भगवान जीमूतवाहन को त्याग, करुणा और संतान की रक्षा के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। मान्यता है कि उनकी कथा सुनने और पूजा करने से संतान के कल्याण की कामना पूरी होती है।
बिहार के कई क्षेत्रों में महिलाएं जितिया के दिन पारंपरिक तरीके से पूजा करती हैं। कुछ स्थानों पर आंगन में प्रतीकात्मक पोखर बनाया जाता है और उसके पास पाकड़ का पेड़ स्थापित कर पूजा की जाती है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा की सामग्री और विधि में भी अंतर देखने को मिलता है।
जितिया में नहाय-खाय और ओठगन क्या होता है?
जितिया पर्व की शुरुआत कई क्षेत्रों में नहाय-खाय से होती है। इस दिन महिलाएं स्नान और पूजा के बाद पारंपरिक भोजन ग्रहण करती हैं और अगले दिन के कठिन व्रत की तैयारी करती हैं।
इसके बाद ओठगन की परंपरा आती है। अलग-अलग क्षेत्रों में ओठगन के नियम और भोजन की परंपराएं अलग हो सकती हैं। मिथिलांचल सहित बिहार के कुछ हिस्सों में स्थानीय खान-पान की परंपराएं जितिया पर्व का विशेष हिस्सा हैं। कहीं मरुआ से बने व्यंजन तो कहीं अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थों का प्रचलन मिलता है।
जितिया व्रत में निर्जला उपवास
मुख्य जितिया व्रत की सबसे कठिन परंपरा निर्जला उपवास है। व्रती महिलाएं संतान की लंबी उम्र और मंगलकामना के लिए बिना जल ग्रहण किए व्रत रखती हैं। इसी वजह से इसे कठिन व्रतों में गिना जाता है।
व्रत के दौरान महिलाएं पूजा-पाठ करती हैं, भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनती हैं और अपनी संतान के लिए मंगलकामना करती हैं। अगले दिन निर्धारित समय और स्थानीय परंपरा के अनुसार पारण के बाद व्रत पूरा किया जाता है।
बिहार में जितिया की अलग पहचान
बिहार में जितिया केवल पूजा और उपवास तक सीमित पर्व नहीं है। यह परिवार और समाज को जोड़ने वाली लोक परंपरा भी है। अलग-अलग जिलों और समुदायों में इसके रीति-रिवाज, भोजन, पूजा सामग्री और लोकगीतों में अंतर देखने को मिलता है।
मिथिलांचल में जितिया से जुड़ी खान-पान की परंपराएं विशेष रूप से चर्चित हैं। वहीं बिहार के अन्य क्षेत्रों में भी महिलाएं समूह में पूजा करती हैं और जितिया की कथा एवं लोकगीतों के माध्यम से इस पर्व की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।
जितिया व्रत का धार्मिक और सामाजिक संदेश
जितिया व्रत की धार्मिक मान्यताओं के केंद्र में संतान की सुरक्षा और उसके सुखी जीवन की कामना है। वहीं इसकी कथा त्याग, करुणा और दूसरे के जीवन की रक्षा जैसे मूल्यों को सामने रखती है।
इस पर्व में मां का अपनी संतान के प्रति प्रेम और उसके लिए कठिन तप करने की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। यही वजह है कि बिहार और आसपास के क्षेत्रों में पीढ़ियों से जितिया की परंपरा श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती रही है।
जितिया पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मातृ प्रेम, त्याग, आस्था और पारिवारिक परंपरा का ऐसा संगम है, जिसने इसे बिहार के प्रमुख लोकपर्वों में एक अलग पहचान दी है।
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साभार: Ekhabri


