होम Chhattisgarh सरहुल-करमा की थाप पर झूमा लोकरंग, आदिवासी संस्कृति ने बांधा समां
Chhattisgarh

सरहुल-करमा की थाप पर झूमा लोकरंग, आदिवासी संस्कृति ने बांधा समां

WhatsApp Facebook
सरहुल-करमा की थाप पर झूमा लोकरंग, आदिवासी संस्कृति ने बांधा समां

For latest updates, join our official groups:

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

रायपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत को मंच देने वाले तीन दिवसीय लोकरंग पर्व का मंगलवार को रंगारंग समापन हुआ। पर्व का अंतिम दिन सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति के नाम रहा। पहली बार लोकरंग पर्व के मंच पर जशपुर अंचल के सरहुल और करमा नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति देखने को मिली। पारंपरिक वेशभूषा, लोकधुनों और कलाकारों की ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया

IMG-20260909-WA0002-300x144 सरहुल-करमा की थाप पर झूमा लोकरंग, आदिवासी संस्कृति ने बांधा समां

जशपुर के विजय कुमार भगत के दल ने सरहुल और करमा नृत्य की प्रस्तुति दी। प्रकृति, आदिवासी लोकजीवन और सामुदायिक परंपराओं से जुड़े इन लोकनृत्यों के जरिए दर्शकों को जनजातीय अंचल की सांस्कृतिक विविधता को करीब से जानने का अवसर मिला। कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति, पारंपरिक लय और रंग-बिरंगी वेशभूषा ने कार्यक्रम में विशेष आकर्षण जोड़ा।

 

कार्यक्रम में रायपुर के डॉ. रामनारायण नेताम ने आदिवासी लोकगीत और नृत्य की प्रस्तुति दी। दुर्ग के नवलदास मानिकपुरी ने लोकगीत-संगीत से माहौल को सुरमय बनाया। भिलाई की आरती बारले ने पंथी नृत्य की ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति देकर खूब तालियां बटोरीं। वहीं रायपुर की रमादत्त जोशी की नाचा-गम्मत प्रस्तुति ने हास्य, मनोरंजन और लोकनाट्य के रंगों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।

 

लोककलाओं को मंच देना सांस्कृतिक जिम्मेदारी

 

लोकरंग पर्व के समापन अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सुदूर जनजातीय अंचलों सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए स्थानीय कलाकारों ने अपनी लोककलाओं की शानदार प्रस्तुतियां दीं। ऐसे आयोजन कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ प्रोत्साहन और सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

उन्होंने कहा कि लोकरंग पर्व जैसे आयोजन छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य और पारंपरिक कलाओं के जरिए युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत से जुड़ते हैं। ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को मंच मिलने के साथ विलुप्त होती लोकविधाओं के संरक्षण और संवर्धन को भी बढ़ावा मिलता है।

 

तीन दिनों तक दिखी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता

 

तीन दिवसीय लोकरंग पर्व में छत्तीसगढ़ के अलग-अलग अंचलों की लोकसंस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को मंच मिला। अंतिम दिन सरहुल, करमा, आदिवासी लोकगीत, पंथी और नाचा-गम्मत की प्रस्तुतियों ने प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को जीवंत रूप में सामने रखा।

 

कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, छत्तीसगढ़ के कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा, फिल्म बोर्ड की सदस्य प्रसन्ना अवस्थी और समाजसेवी उदयभान चौहान सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

 

लोकरंग पर्व का अंतिम दिन दर्शकों के लिए छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की विविधता और जीवंतता को करीब से अनुभव करने का अवसर बना। कलाकारों की प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियों के साथ उत्साहवर्धन किया। आयोजन ने लोककलाकारों को सम्मानजनक मंच देने के साथ छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकविधाओं को सहेजने, संवारने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संदेश दिया।

The post सरहुल-करमा की थाप पर झूमा लोकरंग, आदिवासी संस्कृति ने बांधा समां appeared first on Ekhabri.com.

Source: Ekhabri

Ekhabri
मीडिया पार्टनर साभार (Syndicated) Ekhabri
मूल लेख पढ़ें ↗
दोस्तों के साथ साझा करें
📰 सम्बन्धित समाचार

यह भी पढ़ें (सम्बंधित ख़बरे)