रंग परब का भव्य समापन, ‘टीस’ और ‘हण्डा’ ने जीता दर्शकों का दिल
रायपुर। संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित ‘रंग परब’ नाट्य श्रृंखला का अंतिम दिन हिंदी नाटक और छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य की प्रभावशाली प्रस्तुतियों के नाम रहा। मुक्ताकाशी मंच पर आयोजित समापन समारोह में ‘टीस’ और ‘हण्डा’ नाटकों ने दर्शकों को मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के विविध रंगों से रूबरू कराया। दोनों प्रस्तुतियों में कलाकारों ने सशक्त अभिनय, संवाद और मंचीय अभिव्यक्ति के माध्यम से रंगमंच की विविधता और उसकी सामाजिक भूमिका को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
अंतिम दिन की पहली प्रस्तुति हिंदी नाटक ‘टीस’ की रही। आचार्य रंजन मोडक, लोकेश साहू एवं साथियों द्वारा प्रस्तुत इस नाटक में मानवीय संवेदनाओं और जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को प्रभावशाली ढंग से मंच पर उकेरा गया। कलाकारों ने अभिनय और संवादों के माध्यम से पात्रों की भावनात्मक स्थितियों को जीवंत किया। नाटक में सामाजिक परिस्थितियों और जीवन के संवेदनशील पक्षों को इस तरह प्रस्तुत किया गया कि दर्शक कथा और पात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ते चले गए।
‘टीस’ की प्रस्तुति में कलाकारों की सहज और प्रभावशाली अभिनय शैली विशेष आकर्षण का केंद्र रही। पात्रों की भावनाओं, संवादों और घटनाक्रम के बीच बेहतर तालमेल ने प्रस्तुति को प्रभावी बनाया। नाटक ने यह संदेश भी दिया कि रंगमंच केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों को सीधे दर्शकों तक पहुंचाने वाली सशक्त कला विधा है।
‘टीस’ के बाद छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य ‘हण्डा’ की प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को लोक संस्कृति और ग्रामीण जीवन के रंगों से सराबोर कर दिया। चंद्रशेखर चकोर, दल प्रमुख एवं निर्देशक, के नेतृत्व में गुड़ी चऊंरा के दल ने लोक जीवन, परंपराओं और ग्रामीण परिवेश की जीवंत झलक मंच पर प्रस्तुत की। कलाकारों ने लोकभाषा, अभिनय और पारंपरिक रंगमंचीय शैली के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं को प्रभावशाली ढंग से जीवंत किया।
‘हण्डा’ की प्रस्तुति के दौरान कलाकारों की ऊर्जा और पारंपरिक शैली ने दर्शकों को खास तौर पर आकर्षित किया। लोक जीवन से जुड़े प्रसंगों और सांस्कृतिक परंपराओं को सहज एवं मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया गया। लोकनाट्य ने दर्शकों को मनोरंजन के साथ अपनी मिट्टी, बोली और परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी दिया।
संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कनौजे ने कहा कि नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक तस्वीर सामने रखने वाली सशक्त विधा है। रंगमंच के माध्यम से कलाकार जीवन के विभिन्न पहलुओं, संवेदनाओं, संघर्षों और सामाजिक सरोकारों को प्रभावी ढंग से दर्शकों तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि नाटक दर्शकों को कथा और पात्रों से जोड़ने के साथ उन्हें सोचने, समझने और सकारात्मक बदलाव की दिशा में प्रेरित भी करता है।
डॉ. कनौजे ने कहा कि रंगमंच संस्कृति, परंपराओं और मानवीय मूल्यों को जीवंत बनाए रखने तथा उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे आयोजनों से विभिन्न रंग शैलियों और लोक परंपराओं को मंच मिलता है। साथ ही कलाकारों को अपनी कला और सृजनात्मकता को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर मिलता है।
रंग परब नाट्य श्रृंखला के अंतिम दिन की दोनों प्रस्तुतियों ने आयोजन को सार्थक समापन दिया। एक ओर ‘टीस’ ने हिंदी रंगमंच के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया, वहीं दूसरी ओर ‘हण्डा’ ने छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य परंपरा, लोकभाषा और ग्रामीण जीवन के रंगों को दर्शकों के सामने जीवंत कर दिया।
अंतिम दिन का मंचन आधुनिक रंगमंचीय अभिव्यक्ति और पारंपरिक लोकनाट्य के सुंदर संगम का साक्षी बना। दोनों प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मनोरंजन के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक चिंतन का अवसर दिया। इसके साथ ही ‘रंग परब’ की पूरी नाट्य श्रृंखला का उद्देश्य भी प्रभावी रूप से सामने आया।
कार्यक्रम में साहित्यकार एवं नाटककार विजय मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, सामाजिक कार्यकर्ता उदयभान चौहान, संस्कृति विभाग के भानु मरकाम और अजय चंद्राकर सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।
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Source: Ekhabri


