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Vijayadashami 2026: दशहरे पर शमी के पत्ते क्यों बांटे जाते हैं? जानिए पेड़ से सोना बरसने की पौराणिक कथा

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Vijayadashami 2026: दशहरे पर शमी के पत्ते क्यों बांटे जाते हैं? जानिए पेड़ से सोना बरसने की पौराणिक कथा

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42715-dussehra-shami-tree-significance Vijayadashami 2026: दशहरे पर शमी के पत्ते क्यों बांटे जाते हैं? जानिए पेड़ से सोना बरसने की पौराणिक कथा

Vijayadashami 2026: दशहरा यानी विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन रावण दहन के साथ कई धार्मिक परंपराएं भी निभाई जाती हैं। इन्हीं में से एक है शमी के पेड़ की पूजा करना और उसके पत्तों को सोना मानकर एक-दूसरे को बांटना। मान्यता है कि शमी के पत्ते बांटने से सुख-समृद्धि आती है और जीवन में शुभता बनी रहती है। लेकिन इस परंपरा के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा प्रचलित है और महाभारत में शमी वृक्ष का क्या महत्व था? आइए जानते हैं।

दशहरे पर शमी वृक्ष की पूजा का क्या है महत्व?

हिंदू धार्मिक परंपराओं में शमी के वृक्ष को शुभ और पूजनीय माना जाता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने और पत्ते बांटने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। लोग शमी के पत्तों को प्रतीकात्मक रूप से सोना मानकर अपने परिजनों, मित्रों और परिचितों को देते हैं। इसे समृद्धि, शुभकामनाओं और आपसी प्रेम का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शमी वृक्ष की पूजा से जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति और कार्यों में सफलता की कामना की जाती है।

महाभारत से भी जुड़ा है शमी वृक्ष का संबंध

शमी वृक्ष का उल्लेख महाभारत से जुड़ी एक प्रचलित कथा में भी मिलता है। मान्यता के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के पेड़ पर छिपाकर रखे थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद अर्जुन ने इसी वृक्ष से अपने हथियार वापस लिए और युद्ध में उनका इस्तेमाल किया। इसके बाद पांडवों ने कौरवों के खिलाफ संघर्ष में विजय हासिल की। इसी कारण शमी वृक्ष को विजय, साहस और शक्ति से जोड़कर भी देखा जाता है। विजयादशमी पर इसकी पूजा को शुभ कार्यों की शुरुआत और सफलता की कामना से भी जोड़ा जाता है।

कौत्स और राजा रघु की कथा से जुड़ी है सोना बांटने की परंपरा

शमी के पत्तों को सोना मानकर बांटने के पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार, महर्षि वरतंतु के शिष्य कौत्स ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरु दक्षिणा देने की इच्छा जताई। महर्षि ने उनसे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांगीं। इतनी बड़ी राशि जुटाने के लिए कौत्स राजा रघु के पास पहुंचे।

राजा रघु ने धन जुटाने का लिया संकल्प

कथा के मुताबिक, राजा रघु ने कुछ समय पहले ही एक बड़ा यज्ञ कराया था, जिसके चलते उनका खजाना खाली हो चुका था। कौत्स को खाली हाथ लौटाना उन्हें उचित नहीं लगा। उन्होंने धन जुटाने के लिए तीन दिन का समय मांगा और स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कुबेर से धन प्राप्त करने का विचार किया। राजा की तैयारी की जानकारी मिलने पर देवराज इंद्र चिंतित हो गए।

शमी वृक्ष के जरिए हुई स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, इंद्र ने कुबेर को राजा रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कराने का आदेश दिया। कथा में बताया जाता है कि कुबेर ने शमी वृक्ष के माध्यम से सोने की मुद्राओं की वर्षा कराई। राजा रघु ने उन मुद्राओं में से आवश्यक धन कौत्स को गुरु दक्षिणा के लिए दे दिया। इसी कथा को विजयादशमी पर शमी के पत्तों को सोने के समान मानकर बांटने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

विजयादशमी पर शमी के पत्ते बांटने का संदेश

दशहरे पर शमी के पत्ते बांटना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि शुभकामनाएं साझा करने का भी प्रतीक है। लोग इन पत्तों को सोने के समान मानकर एक-दूसरे को देते हैं और सुख, समृद्धि तथा सफलता की कामना करते हैं। विजयादशमी पर शमी वृक्ष की पूजा के साथ जुड़ी ये कथाएं भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध विरासत को दर्शाती हैं। 

साभार: Asian News Bharat

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मीडिया पार्टनर साभार (Syndicated) Asian News Bharat
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OneChhattisgarh संपादकीय डेस्क
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