होम › National › Supreme Court on Internet Rights: बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं कर सकते, सुरक्षा के नाम पर पूरी पाबंदी उचित नहीं- सुप्रीम कोर्ट
National

Supreme Court on Internet Rights: बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं कर सकते, सुरक्षा के नाम पर पूरी पाबंदी उचित नहीं- सुप्रीम कोर्ट

WhatsApp Facebook
Supreme Court on Internet Rights: बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं कर सकते, सुरक्षा के नाम पर पूरी पाबंदी उचित नहीं- सुप्रीम कोर्ट

For latest updates, join our official groups:

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

42426-supremecourt Supreme Court on Internet Rights: बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं कर सकते, सुरक्षा के नाम पर पूरी पाबंदी उचित नहीं- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना उनकी स्वतंत्रता, निजता और अभिव्यक्ति के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। इंटरनेट बच्चों के लिए शिक्षा, जानकारी हासिल करने और सामाजिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जो बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ उनके अधिकारों का भी सम्मान करे।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी चंद्रन की पीठ ने 15 अक्टूबर को पारित आदेश में ये टिप्पणियां कीं। आदेश अब सार्वजनिक हुआ है। अदालत ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर विचार करते हुए कहा कि सुरक्षा और स्वतंत्रता को एक-दूसरे के विपरीत नहीं माना जाना चाहिए। बच्चों को दोनों का संरक्षण मिलना जरूरी है।

संविधान के मौलिक अधिकारों से जुड़ा है इंटरनेट का इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट तक पहुंच के महत्व को संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में देखा। अदालत के मुताबिक, इंटरनेट बच्चों को केवल जानकारी उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि उन्हें सीखने, अपनी बात रखने और दूसरों से जुड़ने का अवसर भी देता है।

पीठ ने आगाह किया कि उम्र के आधार पर बच्चों के इंटरनेट या सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने जैसे उपायों के संभावित दुष्परिणामों पर भी विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत की इन टिप्पणियों को बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर लागू हर तरह के नियमन को अमान्य करने वाला फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए पूर्ण प्रतिबंध समाधान नहीं

सुप्रीम कोर्ट बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (CSEAM) की पहचान करने और उसे इंटरनेट से हटाने के उपायों पर विचार कर रहा था। इसी संदर्भ में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की बहस भी सामने आई।

अदालत ने माना कि बच्चों को ऑनलाइन शोषण, अनुचित सामग्री और अन्य डिजिटल खतरों से बचाना जरूरी है। लेकिन इंटरनेट तक उनकी पहुंच पूरी तरह बंद कर देना इसका प्रभावी समाधान नहीं हो सकता। ऐसी पाबंदियों से बच्चों की शिक्षा, जानकारी और सामाजिक संपर्क के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

पीठ ने यह भी चिंता जताई कि कड़े प्रतिबंधों के कारण बच्चे ऐसे प्लेटफॉर्म या वेबसाइटों की ओर जा सकते हैं, जहां निगरानी कम हो और खतरे अधिक हों। इसलिए ऑनलाइन सुरक्षा के उपाय बनाते समय उनके वास्तविक प्रभावों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

दूरदराज के इलाकों और विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए इंटरनेट अहम

अदालत ने इंटरनेट की उपयोगिता पर जोर देते हुए कहा कि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले कई बच्चों के लिए यह शिक्षा और जरूरी जानकारी हासिल करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इंटरनेट के जरिए वे उन संसाधनों तक पहुंच सकते हैं, जो उनके आसपास आसानी से उपलब्ध नहीं होते।

विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए भी इंटरनेट की भूमिका अहम हो सकती है। यह उन्हें समान अनुभवों वाले लोगों से जुड़ने, जानकारी प्राप्त करने और अपनी जरूरतों के अनुरूप संसाधनों तक पहुंचने में मदद करता है। ऐसे में इंटरनेट पर पूर्ण रोक लगाने से इन बच्चों के अवसर भी सीमित हो सकते हैं।

प्रतिबंधों के डर से ऑनलाइन शोषण की शिकायतें दब सकती हैं

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के ऑनलाइन शोषण की शिकायतों को लेकर भी चिंता जताई। अदालत के मुताबिक, यदि बच्चों को यह डर हो कि इंटरनेट इस्तेमाल करने के कारण उन्हें ही दंडित किया जाएगा, तो वे अपने साथ हुई घटना की जानकारी माता-पिता, अभिभावकों या किसी भरोसेमंद वयस्क को देने से बच सकते हैं।

बच्चे कई बार ऑनलाइन दुर्व्यवहार, धमकी या शोषण की घटनाओं के बारे में बताने में पहले से ही हिचकिचाते हैं। प्रतिबंधों के कारण यह झिझक और बढ़ सकती है। इससे समय पर मदद मिलने और अपराध की शिकायत दर्ज कराने में बाधा आ सकती है।

पीठ ने संकेत दिया कि ऐसे हालात बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर सकते हैं। इससे यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने वाले पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के उद्देश्यों पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।

बच्चों को नहीं, ऑनलाइन शोषण के लिए जिम्मेदार लोगों को रोकना जरूरी

अदालत ने ऑनलाइन सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल बच्चों पर डालने के तरीके पर सवाल उठाया। पीठ के अनुसार, बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री और इसके निर्माण, प्रसार या इस्तेमाल के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना जरूरी है।

सिर्फ बच्चों को सोशल मीडिया या इंटरनेट से दूर रखने से आपत्तिजनक सामग्री का प्रसार अपने आप नहीं रुकता। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाए, अपराधियों की जवाबदेही तय करे और बच्चों को जरूरत पड़ने पर सहायता मांगने का सुरक्षित अवसर दे।

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों का मुख्य संदेश यही है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और उनके अधिकारों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। इंटरनेट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसे उपायों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जो बच्चों को सुरक्षित रखते हुए शिक्षा, अभिव्यक्ति और जानकारी तक उनकी पहुंच भी बनाए रखें।

साभार: Asian News Bharat

Asian News Bharat
मीडिया पार्टनर साभार (Syndicated) Asian News Bharat
मूल लेख पढ़ें
दोस्तों के साथ साझा करें
OneChhattisgarh संपादकीय डेस्क
संपादकीय डेस्कOneChhattisgarh संपादकीय डेस्क

OneChhattisgarh.Com संपादकीय टीम — छत्तीसगढ़ की ताज़ा खबरें, सरकारी योजनाएं, रोजगार समाचार व जनहित के मुद्दों पर निष्पक्ष और सटीक पत्रकारिता।

सभी लेख देखें →
सम्बन्धित समाचार

यह भी पढ़ें (सम्बंधित ख़बरे)