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CG News: रायपुर के इस बरगद के नीचे बनती थी आजादी की रणनीति, जैतूसाव मठ से जुड़ा है गौरवशाली इतिहास

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CG News: रायपुर के इस बरगद के नीचे बनती थी आजादी की रणनीति, जैतूसाव मठ से जुड़ा है गौरवशाली इतिहास

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Raipur Jaitusav Math Freedom Struggle: रायपुर जैतूसाव मठ स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी कहानी अपने अंदर समेटे हुए है, जिसका एक अहम हिस्सा आज भी पुरानी बस्ती में मौजूद है। यहां स्थित जैतूसाव मठ कभी स्वतंत्रता सेनानियों और विचारकों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता था। इसी मठ के पास मौजूद एक पुराना बरगद का पेड़ आज भी उस दौर की याद दिलाता है।बताया जाता है कि इसी बरगद की छांव में बैठकर स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन की रणनीति पर चर्चा करते थे। उस दौर में रायपुर की पुरानी बस्ती केवल धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र नहीं थी, बल्कि देश की आजादी की लड़ाई से जुड़े विचारों का भी महत्वपूर्ण स्थान बन गई थी।

रायपुर जैतूसाव मठ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इतिहास के अनुसार, जैतूसाव मठ के आसपास का क्षेत्र स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान काफी महत्वपूर्ण था। इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार, बरगद के पेड़ के नीचे स्वतंत्रता सेनानी बैठते और देश को अंग्रेजों से आजाद कराने की रणनीति पर विचार करते थे।जैतूसाव मठ स्वतंत्रता सेनानियों के आने-जाने का प्रमुख स्थान था। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, महंत लक्ष्मीनारायण दास, पंडित सुंदरलाल शर्मा, खूबचंद बघेल और ठाकुर प्यारेलाल जैसे नामों का इस क्षेत्र से जुड़ाव बताया जाता है।आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन पुरानी बस्ती में मौजूद यह बरगद उस दौर की यादों को अपने भीतर समेटे हुए है।

हलधर शास्त्री ने दिलाई थी शपथ
रायपुर जैतूसाव मठ स्वतंत्रता संग्राम की कहानी में पंडित हलधर शास्त्री का भी खास स्थान बताया जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, वे अपने समय के बड़े विद्वान और विचारक माने जाते थे। उन्हें संस्कृत का गहरा ज्ञान था और यहां तक कि कुछ अंग्रेज अधिकारी भी उनसे संस्कृत सीखने आते थे।बताया जाता है कि इसी ऐतिहासिक बरगद के पास पंडित हलधर शास्त्री ने महंत लक्ष्मीनारायण दास को स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने की शपथ दिलाई थी। इसके बाद महंत लक्ष्मीनारायण दास सामाजिक और राष्ट्रीय गतिविधियों में और अधिक सक्रिय होते गए।
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अंग्रेज अधिकारी भी लेते थे संस्कृत का ज्ञान
पंडित हलधर शास्त्री की विद्वता का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि अंग्रेज अधिकारी भी उनसे संस्कृत का ज्ञान लेने पहुंचते थे। इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र के मुताबिक, जब अंग्रेज अधिकारी उनके घर संस्कृत पढ़ने आते थे तो वे बाहर तांगे में बैठकर इंतजार करते थे।शास्त्री जी अपने घर के छज्जे से उन्हें संस्कृत का ज्ञान देते थे। यह प्रसंग उस समय की सामाजिक और बौद्धिक परिस्थितियों की एक अलग तस्वीर सामने रखता है।

महंत लक्ष्मीनारायण दास ने निभाई अहम भूमिका
रायपुर जैतूसाव मठ स्वतंत्रता संग्राम में महंत लक्ष्मीनारायण दास की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। मठ का महंत बनने के बाद वे धार्मिक गतिविधियों के साथ सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय होने लगे थे।साल 1920 में महात्मा गांधी पहली बार छत्तीसगढ़ पहुंचे थे। उनके विचारों का महंत लक्ष्मीनारायण दास पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ चलने वाले आंदोलनों में अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी।असहयोग आंदोलन के दौर में भी उनकी सक्रियता का उल्लेख मिलता है। इस तरह जैतूसाव मठ धीरे-धीरे धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक और राष्ट्रीय विचारों का भी प्रमुख केंद्र बनता गया।

सिर्फ मठ नहीं, विचारों का केंद्र भी था जैतूसाव मठ
जैतूसाव मठ की पहचान केवल धार्मिक स्थल के तौर पर नहीं रही। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में यहां स्वतंत्रता सेनानियों के साथ बुद्धिजीवियों और विचारकों की भी आवाजाही रहती थी।रायपुर जैतूसाव मठ स्वतंत्रता संग्राम की यह विरासत आज भी पुरानी बस्ती की पहचान का हिस्सा है। बरगद का पेड़, मठ और इससे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएं बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों या राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं थी।रायपुर की पुरानी बस्ती में मौजूद यह स्थान उन लोगों की याद दिलाता है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने स्तर पर योगदान दिया। आज जरूरत है कि ऐसे ऐतिहासिक स्थलों और उनसे जुड़ी कहानियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, ताकि स्वतंत्रता संग्राम की स्थानीय विरासत इतिहास के पन्नों तक सीमित न रह जाए।

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Source: Nishaanebaz

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मीडिया पार्टनर साभार (Syndicated) Nishaanebaz
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