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Bastar Dussehra Kachan Devi: कांटों के झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने दी अनुमति, 12 साल की पीहू पर सवार हुईं काछनदेवी, 618 साल पुरानी परंपरा निभाई गई

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Bastar Dussehra Kachan Devi: कांटों के झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने दी अनुमति, 12 साल की पीहू पर सवार हुईं काछनदेवी, 618 साल पुरानी परंपरा निभाई गई

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41892-bastar-dussehra-kachan-devi Bastar Dussehra Kachan Devi: कांटों के झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने दी अनुमति, 12 साल की पीहू पर सवार हुईं काछनदेवी, 618 साल पुरानी परंपरा निभाई गई

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ में 75 दिनों तक चलने वाले प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की काछनगादी की रस्म निभाई गई। शनिवार रात जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में रस्म पूरी हुई। इस दौरान पनका समाज की 12 साल की पीहू दास पर काछनदेवी सवार हुई।

देवी ने बेल के कांटों से बने खास झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति दी। इसके बाद बस्तर दशहरा की दूसरी धार्मिक रस्में भी शुरू हो गई है।

नौ दिनों तक पूजा और उपवास

काछनगादी की रस्म निभाने वाली पीहू दास पांचवीं कक्षा की छात्रा हैं। इस अनुष्ठान से पहले उन्होंने करीब नौ दिनों तक देवी की पूजा की और उपवास रखा। पीहू चौथी बार इस परंपरा में शामिल हो रही हैं।

41893-pihu Bastar Dussehra Kachan Devi: कांटों के झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने दी अनुमति, 12 साल की पीहू पर सवार हुईं काछनदेवी, 618 साल पुरानी परंपरा निभाई गई

इससे पहले पनका समाज की अनुराधा ने करीब पांच से छह साल तक यह जिम्मेदारी निभाई थी। काछनगादी में पनका समाज की कन्या की भूमिका पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है।

22 पीढ़ियों से एक परिवार बना रहा कांटों का झूला

काछनगादी के दौरान इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों का झूला भी इस परंपरा की खास पहचान है। लामनी गांव के जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से झूला बनाने की जिम्मेदारी निभाता आ रहा है।

परिवार के सदस्य जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर पारंपरिक तरीके से झूला तैयार करते हैं। इस धार्मिक जिम्मेदारी को निभाने के लिए परिवार में विशेष तैयारियां की जाती हैं। रस्म से जुड़े नौ दिनों के दौरान परिवार के घर में अखंड दीपक जलाने की परंपरा भी है।

41894-p-2 Bastar Dussehra Kachan Devi: कांटों के झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने दी अनुमति, 12 साल की पीहू पर सवार हुईं काछनदेवी, 618 साल पुरानी परंपरा निभाई गई

पीढ़ियां बदलने के बावजूद परिवार इस जिम्मेदारी को आगे बढ़ाता रहा है। यह परंपरा स्थानीय समुदायों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है।

नवरात्र से पहले होती है काछनगादी की रस्म

बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में शामिल काछनगादी नवरात्र से ठीक एक दिन पहले आयोजित की जाती है। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर काछनदेवी से उत्सव मनाने की अनुमति मांगते हैं।

परंपरा के अनुसार, देवी की अनुमति मिलने के बाद आतिशबाजी की जाती है। काछनदेवी को रण की देवी के रूप में भी जाना जाता है। इस आयोजन में पनका समाज की महिलाएं धनकुल वादन के साथ पारंपरिक गीत भी गाती हैं।

रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व

बस्तर दशहरा से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में रैला देवी की पूजा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। काछनगादी के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा का विधान है। इन आयोजनों में बस्तर संभाग के साथ दूसरे क्षेत्रों से भी लोग पहुंचते हैं।

आज से शुरू होंगी दशहरा की अगली रस्में

काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद दशहरा की अगली धार्मिक रस्में शुरू होती हैं। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, रविवार को कलश स्थापना के साथ जोगी बिठाई की रस्म निभाई जाएगी।

बस्तर दशहरा की खासियत यह है कि इसमें अलग-अलग समुदायों, गांवों और परिवारों को विशिष्ट जिम्मेदारियां मिली हुई हैं। कहीं रथ निर्माण की परंपरा निभाई जाती है, तो कहीं पूजा और अनुष्ठानों की जिम्मेदारी पीढ़ियों से आगे बढ़ाई जाती है। यही परंपराएं बस्तर दशहरा को अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान देती हैं।

साभार: Asian News Bharat

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मीडिया पार्टनर साभार (Syndicated) Asian News Bharat
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