माता ब्रह्मचारिणी का प्रिय फूल है सफेद गुलाब, चमेली और कमल, आज करें इस विधि के साथ देवी की पूजा
रायपुर. नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। कहते हैं मां दुर्गा के इस स्वरूप की उपासना से आत्मसंयम, धैर्य, आंतरिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रगति का आशीर्वाद मिलता है। माता ब्रह्मचारिणी को सफेद रंग अतिप्रिय है इसलिए दूसरे नवरात्र के दिन इस रंग के कपड़े पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है। अगर माता के प्रिय भोग की बात करें तो माता को चीनी या मिश्री का भोग अत्यंत प्रिय हैं। कहते हैं इस भोग से माता शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों के सारे दुख-दर्द दूर कर देते हैं। वहीं माता के प्रिय मंत्र की बात करें तो माता की पूजा में ‘ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः’ मंत्र का जाप अत्यंत शुभ माना जाता है। चलिए अब जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, मुहूर्त, मंत्र, कथा, आरती समेत संपूर्ण जानकारी।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में सफेद या पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पूजा स्थान पर माता की प्रतिमा के आगे घी का दीपक जलाएं। माता को सफेद या लाल फूल अर्पित करें।
साथ ही अक्षत, कुमकुम और चंदन आदि सामग्री अर्पित करें।
फिर माता के बीज मंत्र का 108 बार जाप करें।
देवी को चीनी, मिश्री और फल का भोग लगाएं।
फिर मां ब्रह्मचारिणी की आरती करें।
इसके बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों में बांट दें। मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय फूल सफेद गुलाब, चमेली और कमल है
मां ब्रह्मचारिणी मंत्र
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः
या देवी सर्वभूतेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
मां ब्रह्मचारिणी की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी ने अपने पूर्व जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। माता अपनी तपस्या के दौरान केवल फल-फूल खाकर जीवित रहीं और कभी-कभी पत्तों का भोजन करती थीं। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उन्हें “ब्रह्मचारिणी” नाम से जाना गया। माता पार्वती ने अपनी निष्ठा और तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और अंततः उन्हें पति रूप में प्राप्त किया।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का महत्व
हिंदू धर्म में मां ब्रह्मचारिणी भक्ति, तप, धैर्य और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतिनिधित्व करती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माँ ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इसी तप और त्याग के कारण मां दुर्गा के इस स्वरूप को ब्रह्मचारिणी कहा गया।
मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान मंत्र
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥
परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
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साभार: Ekhabri


