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Raipur News: जयस्तंभ चौक पर दी फांसी, फिर तोप से उड़ाया शरीर… जानें अंग्रेजों को खुली चुनौती देने वाले वीर नारायण सिंह की अमर कहानी

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Raipur News: जयस्तंभ चौक पर दी फांसी, फिर तोप से उड़ाया शरीर… जानें अंग्रेजों को खुली चुनौती देने वाले वीर नारायण सिंह की अमर कहानी

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Nishaanebaz News Desk-Veer Narayan Singh: भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ दिल्ली, कानपुर या झांसी तक सीमित नहीं थी। देश के अलग-अलग हिस्सों में भी ऐसे वीर सामने आए, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई। वीर नारायण सिंह की शहादत छत्तीसगढ़ के इसी गौरवशाली इतिहास का अहम हिस्सा है। उन्हें छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में गिना जाता है।रायपुर का जयस्तंभ चौक आज शहर के प्रमुख स्थानों में शामिल है, लेकिन इतिहास में इस जगह की पहचान एक बेहद दर्दनाक घटना से भी जुड़ी है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यहीं 10 दिसंबर 1857 को वीर नारायण सिंह को अंग्रेजी शासन ने फांसी दी थी। उनके बलिदान ने छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की कहानी को नई पहचान दी।

वीर नारायण सिंह की शहादत को समझने के लिए उनकी शुरुआती जिंदगी को जानना जरूरी है। नारायण सिंह का संबंध सोनाखान से था। सोनाखान रियासत का इलाका आज के बलौदाबाजार-भाटापारा क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। वे जनता के बीच रहने और उनकी परेशानियों को समझने वाले शासक के रूप में जाने जाते थे।कहा जाता है कि नारायण सिंह को घुड़सवारी का काफी शौक था और वे अपने इलाके का दौरा करते रहते थे। इसी दौरान उनकी बहादुरी से जुड़ी एक घटना सामने आई, जिसने उनके नाम के साथ ‘वीर’ शब्द को जोड़ दिया।

नरभक्षी शेर से भिड़ने की कहानी
वीर नारायण सिंह की शहादत से पहले उनकी बहादुरी की कई कहानियां लोगों के बीच प्रचलित थीं। एक लोकप्रिय विवरण के अनुसार, सोनाखान क्षेत्र में एक नरभक्षी शेर के आतंक से लोग परेशान थे। इसकी जानकारी मिलने के बाद नारायण सिंह तलवार लेकर शेर का सामना करने निकल पड़े।बताया जाता है कि उन्होंने शेर को मारकर लोगों को उसके डर से राहत दिलाई। उनकी इसी बहादुरी के बाद वे वीर नारायण सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस घटना से जुड़ी अलग-अलग कथाएं इतिहास और लोक परंपरा में मिलती हैं।
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अकाल ने बदल दी संघर्ष की दिशा
वीर नारायण सिंह की शहादत की सबसे बड़ी वजहों में 1856 का अकाल और उसके बाद पैदा हुई परिस्थितियां मानी जाती हैं। उस समय इलाके में अनाज की कमी थी और आम लोगों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया था।ऐसे समय में नारायण सिंह ने गरीब और भूखे लोगों की मदद करने का फैसला किया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने कसडोल क्षेत्र के कुछ अनाज व्यापारियों के गोदामों से अनाज लेकर जरूरतमंद लोगों में बांट दिया। उनके इस कदम को अंग्रेजी प्रशासन ने कानून के खिलाफ माना।

अंग्रेजों ने लगाया गंभीर आरोप
वीर नारायण सिंह की शहादत की कहानी यहीं से निर्णायक मोड़ लेती है। अनाज बांटने की घटना के बाद ब्रिटिश प्रशासन की नजर उन पर गई। उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई और उन्हें पकड़ने की कोशिश की गई।बताया जाता है कि नारायण सिंह ने गिरफ्तारी से बचने के लिए कुछ समय तक पहाड़ी क्षेत्र में शरण ली। बाद में अंग्रेजी प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके ऊपर लूट और विद्रोह से जुड़े आरोप लगाए गए।

1857 की क्रांति के दौर में बढ़ा विद्रोह
वीर नारायण सिंह की शहादत का समय भी बेहद महत्वपूर्ण था। वर्ष 1857 में देश के कई हिस्सों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह फैल चुका था। इसी दौर में छत्तीसगढ़ में भी अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था।नारायण सिंह का संघर्ष केवल व्यक्तिगत विरोध नहीं था। उनके साथ जुड़ी कहानी में भूख से परेशान जनता, अंग्रेजी प्रशासन की नीतियों और स्थानीय लोगों की आवाज प्रमुख रूप से सामने आती है। यही वजह है कि बाद के वर्षों में उन्हें छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख चेहरों में याद किया गया।

जयस्तंभ चौक बना बलिदान का गवाह
रायपुर का जयस्तंभ चौक आज शहर की पहचान का हिस्सा है। लेकिन इतिहास के पन्नों में यह जगह वीर नारायण सिंह के बलिदान से जुड़ी है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, 10 दिसंबर 1857 को अंग्रेजी शासन ने उन्हें यहां फांसी दी थी।बाद में उनके शव को फिर तोप से उड़ा दिया गया और इस तरह से भारत के एक सच्चे देशभक्त की जीवनलीला समाप्त हो गई।उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी कहानी खत्म नहीं हुई। बल्कि समय के साथ वीर नारायण सिंह का नाम छत्तीसगढ़ की स्वतंत्रता चेतना और आदिवासी संघर्ष के प्रतीक के रूप में सामने आता गया।

आज भी याद किया जाता है उनका बलिदान
वीर नारायण सिंह की शहादत आज छत्तीसगढ़ के इतिहास और लोक स्मृति का हिस्सा है। उनके सम्मान में राज्य सरकार की ओर से उनके नाम पर पुरस्कार भी स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के बीच सामाजिक जागरूकता और उत्थान के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले लोगों और संस्थाओं को सम्मानित करना है।वीर नारायण सिंह की कहानी केवल एक स्वतंत्रता सेनानी के बलिदान की कहानी नहीं है। यह उस दौर की भी याद दिलाती है जब भूख, अन्याय और अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्थानीय स्तर पर आवाज उठ रही थी। वीर नारायण सिंह की शहादत आज भी छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी को अपने इतिहास और संघर्ष की याद दिलाती है।

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Source: Nishaanebaz

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मीडिया पार्टनर साभार (Syndicated) Nishaanebaz
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