महासमुंद में किसानों की बदली किस्मत, मछली पालन बना कमाई का नया जरिया
रायपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गांव, गरीब और किसान को सशक्त बनाने के विजन के अनुरूप प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन रही है। धान की पारंपरिक खेती के साथ अब जिले के करीब 150 किसान मछली पालन, हैचरी और पाउंड लाइनर जैसी आधुनिक गतिविधियों से जुड़कर अपनी आमदनी के नए रास्ते तैयार कर रहे हैं। सरकारी अनुदान और बुनियादी सुविधाओं के विकास से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।

बिरकोनी के किसान दिनेश चंद्राकर ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का लाभ लेकर मछली पालन को अपनी आजीविका का मजबूत जरिया बनाया है। पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत को देखते हुए उन्होंने मछली पालन की ओर कदम बढ़ाया। योजना के तहत उन्होंने करीब 7.50 लाख रुपए की लागत से एक हेक्टेयर क्षेत्र में तालाब का निर्माण कराया। इसके अलावा करीब 14 लाख रुपए की लागत से 20 हजार वर्गफुट क्षेत्र में मछली हैचरी स्थापित की।
दिनेश चंद्राकर की हैचरी में तैयार मछली के बच्चे तालाब में डाले जाते हैं। करीब 8 से 9 महीने में यहां लगभग 15 टन मछली का उत्पादन हो जाता है। उत्पादन में करीब 70 से 80 रुपए प्रति किलो की लागत आने के बावजूद बाजार में मछली 120 से 150 रुपए प्रति किलो तक बिकने से उन्हें अच्छी आय प्राप्त हो रही है।
इसी तरह ग्राम बकमा के किसान हिमांशु चंद्राकर ने भी प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का लाभ उठाकर मछली पालन को स्थायी आय का जरिया बनाया है। उन्होंने लगभग 28 लाख रुपए की लागत से दो पाउंड लाइनर यूनिट तैयार कराईं। सरकार से 60 प्रतिशत अनुदान मिलने के बाद सभी खर्चों को निकालकर उन्हें सालाना करीब 3 से 4 लाख रुपए की शुद्ध बचत हो रही है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत किसानों और मछली पालकों को तालाब निर्माण, बायोफ्लॉक यूनिट, मछली बीज हैचरी, कोल्ड स्टोरेज और मछली दाना निर्माण जैसी गतिविधियों के लिए सहायता दी जा रही है। इन सुविधाओं के विस्तार से मछली पालन को आधुनिक और लाभकारी व्यवसाय के रूप में बढ़ावा मिल रहा है।
मछली पालन का लाभ केवल यूनिट संचालकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय मजदूरों को भी नियमित रोजगार मिल रहा है। बिरकोनी के मजदूरों के अनुसार, पहले उन्हें रोजगार की तलाश में दूसरे स्थानों पर जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में ही सालभर काम उपलब्ध हो रहा है। करीब 9 हजार रुपए प्रतिमाह की आय से उनके परिवारों के जीवनयापन में भी आसानी हुई है।
योजना के तहत बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए नए तालाबों के निर्माण के साथ बायोफ्लॉक यूनिट, हैचरी, कोल्ड स्टोरेज और मछली दाना निर्माण जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। योजना के प्रावधानों के अनुसार महिला, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के हितग्राहियों को 60 प्रतिशत तक तथा सामान्य वर्ग के हितग्राहियों को 40 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है।
महासमुंद जैसे जिले में जहां बड़ी संख्या में किसान पारंपरिक रूप से धान की खेती पर निर्भर हैं, वहां मछली पालन अब अतिरिक्त आमदनी के साथ आत्मनिर्भरता का नया माध्यम बन रहा है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के जरिए आधुनिक तकनीक, सरकारी सहायता और स्थानीय रोजगार के अवसरों का विस्तार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे रहा है।
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Source: Ekhabri


